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Mirza Ghalib Shayari - कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना,
कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना,

है यों, कि मुझको दुर्दे-तहे-ज़ाम बहुत है।
(दुर्दे-तहे-ज़ाम- शराब की प्यालियों में बची हुई शराब/तलछट)

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Alisha Patel 5 July 2014 at 2:34 PM  

very entrusting shayari: http://tinyurl.com/nel4twp

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