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दो इँसानो को मिलते कैसे देख सकते है

दिल से मिले दिल तो सजा देते है लोग​,
​प्यार के जज्बातों को डुबा देते है लोग,
​दो इँसानो को मिलते कैसे देख सकते है​,
जब साथ बैठे दो परिन्दो को भी उठा देते है लोग.

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यूँ तो हर मोड़ पर मिले कुछ दगाबाज लेकिन

बर्बादी का दोष दुश्मनों को देता रहा मैं अब तलक,
दोस्तों को भी परख लिया होता तो अच्छा होता,
यूँ तो हर मोड़ पर मिले कुछ दगाबाज लेकिन,
आस्तीन को भी झठक लिया होता तो अच्छा होता।

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काश वो नगमें हमें सुनाए ना होते

काश वो नगमें हमें सुनाए ना होते,
आज उनको सुनकर ये आंसू ना आए होते;
अगर इस तरह भूल जाना ही था,
तो इतनी गहराई से दिल में समाए ना होते।

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तेरी नज़रों से दूर जाने के लिए

तेरी नज़रों से दूर जाने के लिए तैयार तो थे हम,
फिर इस तरह, नज़रें घुमाने की जरूरत क्या थी,
तेरे एक इशारे पे, हम इल्जाम भी अपने सिर ले लेते​,
फिर बेवजह, झूठे इल्जाम लगाने की जरुरत क्या थी।

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चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं

चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं,
इस शौक में अपने बड़े नुकसान किये हैं,
महफ़िल में मुझे गालियाँ देकर है बहुत खुश,
जिस शख्स पर मैंने बड़े एहसान किये हैं।

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मैं तो शीशा हूँ टूटना मेरी फ़ितरत है

मोहब्बत से वो देखते हैं सभी को,
बस हम पर कभी ये इनायत नहीं होती,
मैं तो शीशा हूँ टूटना मेरी फ़ितरत है,
इसलिए मुझे पत्थरों से कोई शिकायत नहीं होती।

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बेच देता मैं खुद को तुम्हारे लिए

सजा लबों से अपने सुनाई तो होती,
रूठ जाने की वजह बताई तो होती,
बेच देता मैं खुद को तुम्हारे लिए,
कभी खरीदने की चाहत जताई तो होती।

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तूने नफ़रत से जो देखा है तो याद आया

तूने नफ़रत से जो देखा है तो याद आया,
कितने रिश्ते तेरी ख़ातिर यूँ ही तोड़ आया हूँ,
कितने धुंधले हैं ये चेहरे जिन्हें अपनाया है,
कितनी उजली थी वो आँखें जिन्हें छोड़ आया हूँ।

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टूट गए बचपन के तेरे सारे खिलौने

एक ग़ज़ल तेरे लिए ज़रूर लिखूंगा,
बे-हिसाब उस में तेरा कसूर लिखूंगा,
टूट गए बचपन के तेरे सारे खिलौने,
अब दिलों से खेलना तेरा दस्तूर लिखूंगा।

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कितनी शिद्दत से उन्हें याद करते हैं हम

हकीक़त कहो तो उनको ख्वाब लगता है,
शिकायत करो तो उनको मजाक लगता है,
कितनी शिद्दत से उन्हें याद करते हैं हम,
और एक वो हैं जिन्हें ये सब इत्तेफाक लगता है।

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यह ज़माने वाले कोई खुदा तो नही

किसी के दिल में बसना कुछ बुरा तो नही,
किसी को दिल में बसाना कोई खता तो नही,
गुनाह हो यह ज़माने की नजर में तो क्या,
यह ज़माने वाले कोई खुदा तो नही।

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जी तो रहें हैं मगर ये ज़िंदगी नहीं है

सपना हैं आँखों में मगर नींद नहीं है,
दिल तो है जिस्म में मगर धड़कन नहीं है,
कैसे बयाँ करें हम अपना हाल-ए-दिल,
जी तो रहें हैं मगर ये ज़िंदगी नहीं है।

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ज़िंदगी हमारी यूँ सितम हो गयी

ज़िंदगी हमारी यूँ सितम हो गयी,
ख़ुशी ना जाने कहाँ दफ़न हो गयी,
बहुत लिखी खुदा ने लोगों की मोहब्बत,
जब आयी हमारी बारी तो स्याही ही ख़त्म हो गयी।

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तेरी तरह बदलना मुझे भी आता है

भुला के मुझको अगर तुम भी हो सलामत,
तो भुला के तुझको संभलना मुझे भी आता है,
नहीं है मेरी फितरत में ये आदत वरना,
तेरी तरह बदलना मुझे भी आता है।

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ज़िंदगी से चले हैं अब इल्ज़ाम लेकर

ज़िंदगी से चले हैं अब इल्ज़ाम लेकर,
बहुत जी चुके हैं अब उनका नाम लेकर,
अकेले बातें करेंगे अब वो इन सितारों से,
अब चले जायेंगे उन्हें यह सारा आसमान देकर।

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अब रूठे हैं तो कोई मनाने नहीं आया

मुद्दत से कोई शख्स रुलाने नहीं आया,
जलती हुई आँखों को बुझाने नहीं आया,
जो कहता था कि रहेंगे उम्र भर साथ तेरे,
अब रूठे हैं तो कोई मनाने नहीं आया।

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फिर ना मिलेंगे अब तुमसे हम कभी

मोहब्बत का मेरा यह सफर आख़िरी है,
ये कागज, ये कलम, ये गजल आख़िरी है,
फिर ना मिलेंगे अब तुमसे हम कभी,
क्योंकि तेरे दर्द का अब ये सितम आख़िरी है।

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कहाँ से लाऊँ हुनर उसे मनाने का

कहाँ से लाऊँ हुनर उसे मनाने का,
कोई जवाब नहीं था उसके रूठ जाने का,
मोहब्बत में सजा मुझे ही मिलनी थी,
क्योंकि जुर्म मेरा था उनसे दिल लगाने का।

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रीत है जाने यह किस ज़माने की

रीत है जाने यह किस ज़माने की,
जो सज़ा मिलती हैं यहाँ किसी से दिल लगाने की,
ना बसाना किसी को दिल में इतना कि,
फिर दुआ माँगनी पड़े रब से उसे भुलाने की।

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हसीनो ने हसीन बन कर गुनाह किया

हसीनो ने हसीन बन कर गुनाह किया,
औरों को तो ठीक पर हमें भी तबाह किया,
अर्ज़ किया जब ग़ज़लों में उनकी बेवफाई का,
औरों ने तो ठीक उन्होंने भी वाह-वाह किया।

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